हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हुज्जतुल इस्लाम इस्माईलज़ादेह ने एक बैठक को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि सामाजिक समस्याओं के समाधान में मस्जिदों की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने बताया कि मदरसा (हौज़ा-ए-इल्मिया) सक्षम और समाज की समस्याओं को समझने वाले मुबल्लिग़ों के प्रशिक्षण को अपनी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल किए हुए है।
उन्होंने कहा कि मस्जिद इस्लामी समाज का केंद्रीय संस्थान है और ऐसे योग्य, जागरूक तथा समाज की चुनौतियों को समझने वाले प्रचारकों की आवश्यकता है, जो मस्जिदों को उनके वास्तविक धार्मिक और सामाजिक स्वरूप में पुनर्जीवित कर सकें।
इस्माईलज़ादेह ने कहा कि मस्जिद केवल इबादत का स्थान नहीं, बल्कि मार्गदर्शन, नैतिक शिक्षा, सामाजिक एकजुटता और मोहल्लों की समस्याओं के समाधान का केंद्र बननी चाहिए। इसके लिए ऐसे धर्मगुरुओं की आवश्यकता है जो धार्मिक ज्ञान के साथ-साथ वर्तमान सामाजिक आवश्यकताओं और चुनौतियों से भी परिचित हों।
उन्होंने मस्जिदों के इमामों के ज्ञानवर्धन पर ज़ोर देते हुए कहा कि यदि प्रांतीय मस्जिद मुख्यालय सहमति देता है, तो इमामों और मस्जिद मामलों के समन्वयकों के लिए समकालीन इतिहास पर विशेष प्रशिक्षण पाठ्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, ताकि वे युवाओं और समाज के विभिन्न वर्गों के प्रश्नों और शंकाओं का प्रमाणिक, वैज्ञानिक और संतोषजनक उत्तर दे सकें।
उन्होंने कहा कि समकालीन इतिहास की जानकारी, इस्लामी क्रांति के इतिहास, शत्रुओं की पहचान और वर्तमान घटनाओं की सही समझ समाज में जागरूकता बढ़ाने तथा मस्जिदों की सांस्कृतिक और शैक्षिक भूमिका को मजबूत करने के लिए आवश्यक है।
उन्होंने यह भी कहा कि मस्जिदों को मोहल्लों के प्रमुख सामाजिक केंद्र के रूप में इस प्रकार संगठित और सशक्त बनाया जाना चाहिए कि वे प्रांत की प्रमुख सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए जनता, विशेषज्ञों और संबंधित संस्थाओं के सहयोग से प्रभावी भूमिका निभा सकें।
अंत में उन्होंने कहा कि हौज़ा-ए-इल्मिया, मस्जिदों के इमामों, प्रबंधन समितियों और आम जनता के बीच जितना अधिक समन्वय और सहयोग बढ़ेगा, मस्जिदें सांस्कृतिक, सामाजिक और शैक्षिक क्षेत्रों में उतनी ही अधिक प्रभावी बनेंगी, जिससे आदर्श इस्लामी मस्जिद की परिकल्पना साकार हो सकेगी।
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